मंगलवार, 9 मार्च 2021

हमारे प्रतिनिधि कवि: 4-मिर्जा ग़ालिब

 हमारे प्रतिनिधि कवि:

4-मिर्जा ग़ालिब
1-गजल
1-
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है |
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है |
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है|
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है|
ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है|
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है|
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है |
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है |
हाँ भला कर तिरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है |
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है |
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है|
2-
कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती |
मौत का एक दिन मुअय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती |
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हँसी
अब किसी बात पर नहीं आती|
जानता हूँ सवाब-ए-ताअत-ओ-ज़ोहद
पर तबीअत इधर नहीं आती |
है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ
वर्ना क्या बात कर नहीं आती|
क्यूँ न चीख़ूँ कि याद करते हैं
मेरी आवाज़ गर नहीं आती |
दाग़-ए-दिल गर नज़र नहीं आता
बू भी ऐ चारागर नहीं आती |
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती|
मरते हैं आरज़ू में मरने की
मौत आती है पर नहीं आती |
काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती|
3-
न था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता,
डुबोया मुझको होने ने न मैं होता तो क्या होता !
हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का,
ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता!
हुई मुद्दत कि 'ग़ालिब' मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !
2-शेर
1. आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
2. बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
3. बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
4. दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ
5. दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
6. हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
7. हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दमनिकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
8. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
9. काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती
10. कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
11. उनको देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं के बीमार का हाल अच्छा है
12. इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे |
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