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शुक्रवार, 2 मार्च 2018

होली

पता करो दारू का रिश्ता कब से जुड़ता होली से
पता करो कब भांग चढ़ी थी, आँख लड़ी थी भोली से |
पता करो कब से देवर है भौजाई के चक्कर में
और कब से भौजाई बैठी भरे थाल रंग रोली से |


दिन हप्तों की बात नहीं ना बात महीनों सालों की
ये सदियों से रही रिवायत छूट रही घरवालों की |
होली के दिन मस्त रहें हम झूमें नाचें चिल्लायें
जो भौजाई बात करे ना खैर मना ले गालों की |



मिलाओ रंग केसरिया हरा नीला गुलाबी भी
हमारी लाल मदिरा का चढ़ाओ रंग शराबी भी |
कि हम हिन्दू ना मुस्लिम हैं ना अगड़े और पिछड़े हैं
कहे कुछ भी ज़माना हम जमाने भर के बिगड़े हैं |



कुछ रंग न बदरंग हैं अब पास हमारे  
बस अंग हैं कुछ ख़ास जो करते हैं इशारे |
पानी की ना बौछार ही हम छोड़ रहे हैं 
कुछ और भी हाँ ख़ास हम छोड़ेंगे शरारे |   

शनिवार, 19 मार्च 2011

''होली के पर्व से जुडी एक कथा यह भी ''

           असुरराज हिरन्यकश्यप  की बहिन होलिका और पडौसी राज्य के राजकुमार एलोजी एक दूसरे को दिलो जान से चाहते थे  | होलिका भी अत्यंत रूपवती  थी |  दोनों  का विवाह निश्चित  हो गया|  हिरन्हयकश्यप  अपने पुत्र के  प्रभु प्रेम भक्ति    से व्यथित था | उसने पुत्र  वध का   संकल्प किया किन्तु अपनी साजिश को दुर्घटना  का रूप दिया  |उसने अपनी बहिन होलिका को पुत्र को आग में जलाकर मारने की आज्ञा दी | होलिका सहमत नहीं हुई  | तब हिरन्यकश्यप ने धमकी दी कि यदि वह ऐसा  नहीं करेगी तो वह एलोजी से उसका विवाह नहीं कराएगा  | होलिका को अग्निकवच प्राप्त था | विवश होकर उसने प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर अग्निप्रवेश किया | यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था | इलोजी बारात  लेकर नियत समय पर पहुंचे |लेकिन इससे पूर्व होलिका दहन हो चुका था|  वहां जाकर जब उन्हें होलिका दहन का पता चला तो वे बहुत व्यथित हुए| इलोजी पर पहाड़  टूट पडा  | उसके बाद उन्होंने  विवाह नहीं किया  और योगी का वेश धारण कर निकल पड़े | राजस्थान में आज भी एलोजी की बरात निकाली जाती है और उनके जोगी बनने के  गीत गाये जाते हैं | पता नहीं क्यों होलिका से जुडी यह  प्रेमकथा जनमानस ने भुला दी, सिर्फ राजस्थान में इलोजी को याद किया जाता है | यदि होली के पर्व से जुडी  अन्य बहुत सी दंतकथाओं को स्वीकार किया जाता  है तो यह कथा  स्वीकार  करने   से भी कुछ   बिगड़ने वाला  नहीं है |